31 अक्टूबर 2019 - 17:38
इराक़ की कहानी, कुछ लफ्ज़ो में, इराकी पत्रकार ने खोले राज़, जाने अबतक कितने लाख लोगों को अमरीका ने मारा है ? आंखें खोल देने वाले

इराक़ के प्रसिद्ध टीकाकार, प्रोफेसर कमाल मजीद ने इराक के हालात का आंखें खोल देने वाला जायज़ा पेश किया है। ज़रूर पढ़ें।

इराक़ में 1/10/2019 में प्रदर्शन आंरभ हुए तो ऐसा लगा कि यह शांतिपूर्व रूप से पानी, बिजली सप्लाई और रोज़गार आदि की मांग के साथ किये जाने वाले प्रदर्शन हैं लेकिन प्रदर्शन आरंभ होते ही सब कुछ बदल गया और प्रदर्शनों ने, दो पक्षों में गंभीर भिड़ंत का विकराल रूप धारण कर लिया। देखते ही देखते देश की सारी समस्याओं का ज़िम्मेदार, प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल मेहदी को बता दिया गया और उनके त्याग पत्र की मांग की जाने लगी। इस पूरे मामले में तीन महत्वपूर्ण चीज़ों पर ध्यान देना ज़रूरी है।

पहली बात तो यह है कि इराक़ में जो भ्रष्टाचार है उसे आदिल अब्दुलमेहदी ने नहीं पैदा किया बल्कि इस भ्रष्टाचार की नींव इराक़ पर क़ब्ज़े के पहले दिन से और टीवी कैमरों के सामने अमरीका ने डाली है जब उसके एजेन्टों और सैनिकों ने इराक़ के संग्रहालय पर धावा बोला और वहां का सब कुछ चुरा लिया फिर खुले आम न्यूयार्क में वह सारी चीज़ें बेची गयीं। अमरीकी एजेन्टों और सैनिकों ने इराक़ के नेशनल लाइब्रेरी को लूट कर दुर्लभ किताबें अमरीका पहुंचा दी जिनमें से कई अब अमरीकी संसद, कांग्रेस की लाइब्रेरी की शोभा बढ़ा रही हैं। अमरीकी सेना और उसके एजेन्टों ने सद्दाम के पतन और सेना के बिखराव के बाद इराक़ के रक्षामंत्रालय और उसकी सेना का सब कुछ लूट लिया। इस लूटमार में आदिल अब्दुलमेहदी का कोई हाथ नहीं था।

    दूसरी बात यह है कि आदिल अब्दुलमेहदी भ्रष्टाचार को खत्म नहीं कर सकते क्योंकि सब से पहले तो उन्हें यह डर है कि भ्रष्टाचारी एकजुट होकर उन्ही को कहीं भ्रष्टाचारी न सिद्ध कर दें। लेकिन प्रदर्शनों से थोड़ा पहले अमरीका से चलने वाले " हुर्रा " टीवी चैनल ने सरकार में भ्रष्टाचार पर और धर्मगुरुओं के खिलाफ कई कार्यक्रम प्रसारित किये और बीबीसी अरबी ने तो अस्थाई शादियों के बारे में एक पूरी डाक्यूमेंट्री प्रसारित कर दी यह सब कुछ, अगले कुछ दिनों में होने वाले प्रदर्शनों को अधिक भड़काने के लिए था।

तीसरी बात यह है कि अमरीका अब्दुल मेहदी को हटाना चाहता है लेकिन इस लिए नहीं कि वह भ्रष्ट है या भ्रष्टाचार के खिलाफ काम नहीं करना चाहते। अमरीका आदिल अब्दुल मेहदी को हिंसक प्रदर्शनों द्वारा इस लिए उनके पद से हटाना चाहता है क्योंकि उन्होंने अमरीका के आर्थिक व राजनीतिक कार्यक्रमों को नुक़सान पहुंचाया है। उन पर स्वंय सेवी बल के समर्थन और उसके साथ सरकारी विभाग की तरह व्यवहार का आरोप है। उन्होंने अमरीकी विदेशमंत्री की चेतावनी के बावजूद, चीन की यात्रा की और चीन के साथ कई महत्वपूर्ण समझौते भी कर लिये।  उन्होनें इसी प्रकार वायु रक्षा के लिए रूस से हथियार लेने की कोशिश की जैसा कि सीरिया, ईरान और तुर्की ने किया। उन्होंने अमरीका की " सेंचुरी डील" योजना को औपचारिक रूप से अस्वीकार दिया। उन्होंने सीरिया और इराक़ के बीच " क़ायम" पास को खोल दिया जिसकी वजह से ईरान के लिए इराक़ से होकर सीरिया तक पहुंचा आसान हो गया। यही नहीं आदिल अब्दुल मेहदी में इतना साहस हो गया कि उन्होंने इराक़ के भीतर स्वंय सेवी बल के ठिकानों पर हमले का आरोप इस्राईल पर लगा दिया और यह उनकी सब से बड़ी गलती थी इस प्रकार से आदिल अब्दुल मेहदी अमरीका के दुश्मन बन गये और अमरीका उनकी सरकार गिराने की योजना बनाने लगा।

     अमरीका से प्रसारित होने वाले टीवी चैनल " हुर्रा" ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि ईरान के जनरल सुलैमानी और इराक़ी स्वंय सेवी बल के कई कमांडरों ने गुप्त बैठक करके प्रदर्शनकारियों और इराक़ के समाजिक कार्यकर्ताओं की हत्या के लिए एक टीम बनाने पर सहमति प्रकट की है। यह रिपोर्ट इराक़ में प्रदर्शनों के दौरान प्रसारित की गयी। इसके बाद सोशल मीडिया पर पूरा अभियान चलाया गया। ज़ाहिर सी बात है इस रिपोर्ट का सीधा सीधा उद्देश्य, लोगों को प्रदर्शनों में अधिक से अधिक भाग लेने के लिए भड़काना था। रूस में आतंकवाद विशेषज्ञ निकोलाई स्टारकोव ने आज एक इराक़ी पत्रकार सलाम मुसाफिर से बात चीत में कहा कि जनता का खून बहाओ ताकि वह सरकार से घृणा करने लगे। वह कहते हैं कि अमरीका, अरब जगत में जनता में फैले रोष का फायदा उठा रहा है। प्रदर्शनों के दौरान, ऊंची- ऊंची इमारतों की छतों से स्नाइपर्स, कभी प्रदर्शनकारियों को कभी पुलिस कर्मियों को निशाना बनाते हैं और बीबीसी और अल्जज़ीरा जैसे टीवी चैनल मरने वाले पुलिस कर्मियों और प्रदर्शनकारियों को दिखाते हैं जिससे प्रदर्शन कारी और भड़क जाते हैं। आप ध्यान दें तो इराक़ में यही सब कुछ हो रहा है। वह कहते हैं कि अमरीकी स्नाइपरों ने ट्यूनेशिया, लीबिया, सीरिया और यमन में यही सब कुछ किया है और अब वह इराक़ में वही कर रहे हैं।

    इराक़ में जो कुछ हो रहा है उसमें बस दो ही पक्ष हैं एक अमरीका और दूसरे इराक़ी नेतृत्व। अब यह इराक़ी जनता की ज़िम्मेदारी है कि वह यह फैसला करे कि उसे किसके साथ रहना है? बस किसी फैसले के पहले इराक़ और दुनिया में अमरीकी करतूतों पर एक नज़र ज़रूर डाल ली जाए।

    अमरीका ने जापान पर दो एटम बम गिराए जिनसे दसियों लाख लोग बेहद क्रूरता के साथ मार डाले गये। अमरीका ने कोरिया युद्ध में तीस लाख लोगों की हत्या की। अमरीका ने लाओस, कंबोडिया और वियतनाम में रासायनिक हथियार इस्तेमाल किये और पचास लाख लोगों को  मार डाला। अमरका ने सन 1979 से अफगानिस्तान में तीस लाख लोगों की हत्या की है और अब भी कर रहा है। अमरीका ने कुवैत युद्ध के दौरान और फिर इराक़ पर हमला करके  तीस लाख इराक़ियों को मौत के घाट उतारा और आज भी उसके स्नाइपर प्रदर्शनों के दौरान इराक़ियों की हत्या कर रहे हैं। अमरीका ने बोस्निया और कोसोवो में यूरेनियम युद्ध बमों से कई हज़ार बेगुनाहों की हत्या की। अमरीका ने सोमालिया, हेटी, पनामा और निकारागोवा में लाखों लोगों को मार डाला। अमरीका ने चिली में पचास हज़ार लोगों को निर्वाचित सरकार के विरुद्ध विद्रोह के दौरान मार डाला, आज उसी के इशारे पर फिलिस्तीन, सीरिया और यमन में बेगुनाहों को मारा जा रहा है। पूरी दुनिया में  130 देशों में अमरीका की 750 सैनिक छावनियां हैं।अफगानिस्तान पर अमरीकी हमले के परिणाम में आंतकवादी संगठन अलक़ाएदा बना, इराक़ पर अमरीकी हमले और जनसंहार के परिणाम में आतंकवादी संगठन दाइश बना, लीबिया पर उसके हमले से कई चरमपंथी गुट बन गये जो अपने ही देश की जनता का जनसंहार कर रहे हैं। सीरिया में अमरीका की वजह से न जाने कितने आतंकवादी गुटों ने जनम लिया। यही वजह है कि अमरीकी करतूतों की जानकारी रखने वाले लोग, नेता और सरकारें, उसके खिलाफ उठ खड़ी हुई हैं। इराक़ी सरकार ने भी अमरीका के सामने डट जाने का फैसला किया तो अमरीका ने इराक़ी सरकार को सज़ा देने का फैसला कर लिया। इराक़ में जो कुछ हो रहा है उसके पीछे बस यही हक़ीक़त है। (Q.A.) साभार, रायुल यौम, लंदन